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लचर है टीबी उन्मूलन का प्रयास !

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महीनेां लेट हो जातें है80प्रतिशत मरीज!

 Gorakhpur: हमारे देश में टीबी के रोगियोें की संख्या में उत्तरोत्तर बृद्धि हो रही है। यह तब हो रहा है जब दुनियां भर में इस बीमारी के उन्मूलन का प्रयास डाट्स जैसे प्रभावकारी ईलाज से किया जा रहा है। देश भर में कमोबेश टीबी के ईलाज व उसकी जानकारी तथा इस बीमारी से भेद- भाव की समस्या लगभग एक जैसी ही है। नेपाल की सीमा से सटे उत्तर प्रदेश के जनपद महराजगंज में श्यामदेउरवां न्यू पी एच सी पर टीबी के मरीजों का हाल समझने पहुंचे तो लगा कि अभी टीबी के प्रति लोगों को जिस तरह जागरुक रहना चाहिए वैसे नही हैं। यहाॅ इसे सर्दी -जुकाम से सम्बंधित मानते है । यहाॅ चिकित्सक काउंसलर व टीबी मरीज के परस्पर ब्यवहार में भी कमी देखने को मिली। ये वो मूलभूत बातें हैं जो देश के प्रत्येक गाॅव में समान रुप से देखने को मिलती हैं।

अस्पताल में काउंसलिग की हालत दयनी !
टीबी उन्मूलन की सबसे बड़ी बाधा अज्ञानता है। इसके अलांवां जिन्हें ज्ञान है उन्हें रसूख की चिंता है। जबकि टीबी ऐसी बीमारी है जो फ्लाइट जोन मे रहने वाले से लेकर सड़क पर भीख मांगने वालों में एक समान रुप से होती है। यहाॅ डीएमसी पर उपस्थित कर्मचारी शायद टीबी के समान दुश्परिणाम पर गौर नहीं करते तभी तो किसी गरीब को यह तक नहीं बताते कि उसे दवा किस बीमारी की चलाई जा रही है। बातचीत में बेलवां गांव की एक महिला ने अपनी समस्या से अवगत कराया कि जब डीएमसी पर बताया कि उसे दवा खाने पर उल्टी हो गयी तो वहाॅ इसे लापरवाही से सरकारी ओहदे का मिसयूज करते हुए उसे दवा शाम को खाने को कह कर उसे वापस भेज दिया गया। उसकी अधूरी या ये कहिए कि घटिया काउंसलिंग करके भेज दिया गया। महिला ने यह समझा कि दवा सुबह- शाम खानीं है, लिहाजा उसने एक दिन इसका पालन कर दिया संयोग कहिये कोई दुर्घटना नही हुई। पर ग्रमीण क्षेत्रों में काउंसलर की लापरववाही गम्भीर बिषय है। देश के स्वास्थ्य के लिहाज से अत्यंत सोचनीय भी।  इन गांवों मेे काम कर रहे एनजीओ सेफ सोसाइटी का प्रयास सराहनीय है उन्होंने क्योर पेसेण्ट की टीबी जागरुकता टीम बनाकर महत्वपूर्ण कार्य किया है। ये लोग मरीजों को न केवल सही जानकारी देतें हैं बल्कि नये मरीज को अस्पताल भी ले जातें हैं। फिलहाल हालत चिंताजनक है।

जिम्मेदार उत्तरदायित् र्निवहन की जरुरत
जिले की श्यामदेउरवां न्यू पीएच सी के अंतर्गत 45 गाॅव आते हैं जिनके ईलाज का जिम्मा सरकार ने इन्हे सौंपा है। इन क्षेत्रों में तीन तरह के सुलभ चिकित्सक कार्य करतें हैं मजे कि बात ये है कि इनके पास चिकित्सा क्षेत्र की कोई डिक्री नही है। पहले वो हैं जो गाॅव में फेरी लगातें हैं। किसी की तबियत खराब है तो इंजेक्सन व ईलाज तुरंत मुहैया करतें हैं। यदि इनसे नहीं बन पाया तो गुमटी में गाॅव के चैराहे पर दवाखाना वाले डाक्टर साहब उनके ईलाज का फिक्स तरीके में से एक है मरीज को लेटाकर ग्लूकोज की बाटल लटकाना। अब यहाॅ भी नहीं ठीक हुए तब ग्रमीण मुख्य चैराहे पर मेडिकल स्टोर से सम्पर्क करतें हैं। फिर वह बताता है कि किस डाक्टर को शहर में दिखाना है। टीबी जैसी बीमारी 15 दिन में अपना भारी असर दिखाना शुरु कर देती है जबकि गाॅव में मरीज महीनों फर्जी डाक्टरों के चक्कर में पड़ा रहता है। चिकित्साधिकारी डा0 ए0के0मणि त्रिपाठी बताते है कि यहाॅ 80 फिसद् टीबी मरीज बहुत हालत खराब हाने पर ही आता है। केवल 20 प्रतिशत ऐसे हैं जो सेफ सोसाइटी व सरकार के जागरुकता अभियान के कारण अब प्रथम आवस्था में ही पहुॅच रहें हंै। श्यामदेउरवा चिकित्साकेन्द्र से प्रत्येक गाॅव की दूरी जो इसके क्षेत्र में आतें है 2 किमी से ज्यादा नहीें है। सरकार के मुताबिक इलाज की सभी सुवधायें पी एच सी पर मौजूद हैं फिर भी यहाॅ मरीज नहीं आतें क्यों ! यह सोचनीय है। गोरखपुर- महराजगंज रोड पर महज 800 मीटर में फैले श्यामदेउरवां चैराहे पर क्षेत्र पंचायत कार्यालय, थाना ,बैंक के साथ साथ दो शराब की दुकान हैं। दुर्भग्य है कि ग्रामीण जरुरत के सभी संसाधन हाने के बावजूद चिकित्सा केन्द्र पर लोग दवा नहीं कराने आ पाते। यह सरकारी दवाखाने की कैसी विश्वसनीयता है! वैसे सरकारी रजिस्टर का टारगेट 35 से 40 मरीज प्रतिदिन तो रोज ही भर लिया जाता है लेकिन इसके उलट गुमटी वाले डाक्टर साहेब के पास प्रतिदिन वास्तविक मरीजों की संख्या 55 से 60 रहती है।
स्वास्थ्य की समस्या को केवल चिकित्सा विभाग के भरोसे छोड़ देना भी रोग से लड़ने के अभियान को कमजोर कर देता। गाॅव में सरकार के लगभग 29 विभिन्न विभगों के कर्मचारी काम करतें है। यदि इनको जिम्मेदारी दी जाय व सही मॅानीटरिंग हो तो बहुत हद तक अभियान सफल रहेंगे। दो दिन से हो रही बारिश के कारण गाॅवों के सम्पर्क्र मार्ग जलप्लावित हो गये थे। बेलवा व लालपिपरा गाॅव में मरीज जिनकी दवा चल रही है या क्योर हो चुके हैं उनसे बातचीत करने जाते समय मार्ग का बुरा हाल देखने को मिला। चिकित्सा केन्द्र तक मरीज का नही पहुॅचने का एक कारण ये भी है। लालपिपरा में हमें 2क्योर व एक रेगुलर दवा खा रहे मरीज मिले जबकि बेलवां में 6 मरीज मिले जिसमें से एक क्योर पेसेण्ट हैं। इन मरीजों के बीच पहुॅच कर पता चला कि बीमारी को लेकर ग्रामीण बहुत लापरवाह होते हैं उन्हे अगर आश्वस्त कर दिया गया कि यह बीमारी ठीक नही हो सकती तो वे मृत्यु की बेसब्री से प्रतिक्षा करने लगते हैं। हाॅ इस इलाके में बीमारी का इलाज ओझा- सोखा से नहीं कराते यह उपलब्धि हैै।
टीबी के इलाज को भयावह कभी न दर्शायंे क्योंकि मरीज के मन में इस बीमारी को लेकर हौवा बना रहता है। ऐसे मरीज में निराशा जल्दी घर कर जाती है। इन्हें काउंसलिग की जबरदस्त आवश्यकता है। सरकारी कर्मचारी हर मामलें में बजट का एलाटमेण्ट देखकर काम करतें है। यह सिर्फ एक काउंसलर की बात नहीं है जिलाधिकारी भी बजट की जानकारी पहले करतें हैं। यहाॅ बजट से अधिक उत्तरदायित्व व जिम्मेदारी महत्वपूर्ण होनी चाहिए। ग्रामसभा व ग्राम समिति को जितना सक्रिय कर सकें साथ ही सरकारी विभाग बीमार ब्यक्तियों की ग्रामवार जाॅच पड़ताल करते रहें जिससे बीमारी भी थाना व कचहरी के तरह सबकी जानकारी में पूरी तरह समाहित हो जाय।

Vaidambh Media

First published in Vaidambh Media. Views expressed are of the author.

Written by JournalistsAgainstTB

September 8, 2015 at 8:08 am

Posted in TB and Media

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