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अब भी जानलेवा है तपेदिक

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तपेदिक यानी टी बी रोग से दुनिया में सबसे ज्यादा मौतें अकेले भारत में होती हैं. यह तथ्य कल जर्मनी की राजधानी बर्लिन में संपन्न “फेंफडों के स्वास्थ्य” विषयक अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन में सामने आया.

This is a story filed by Jasvinder Sehgal from the recently held 41st Union World Conference on Lung Health, Berlin on behalf of DW-World.DE Deutsche Welle

फेंफडों की बीमारी के इलाज को लेकर अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन हो और उदघाटन समारोह से ले कर विभिन्न  तकनीकी गोष्ठियों और शोध पत्रों में भारत के बारें में चिंताएं हों तो इन रोगों की भयावहता का खुद ब खुद अंदाज़ा लगाया जा सकता है.

द यूनियन अगेंस्ट  ट्यूबरकुलोसिस एंड लंग डीसीस द्वारा आयोजित इस सम्मलेन के  उदघाटन समारोह को  संबोधित करते हुए अमरीकी रोग नियंत्रण और बचाव केंद्र के निदेशक डॉक्टर थामस आर फ्रीडन तक ने अपने भाषण में कई बार भारत में फेफडों की बीमारी को लेकर चिंताएं व्यक्त की. और हकीकत भी यही है कि  फेंफडों की बीमारीयों से दुनियां भर में होने वाली एक चौथाई मौतें  भारत में होती हैं जहाँ लगभग दस लाख लोग इन रोगों के कारण  अकाल मृत्यु  के शिकार बन जाते है.  यदि एच आई वी -एड्स,  मलेरिया और टी बी से मरने वालों की कुल संख्या को जोड़ भी लिया जाये तो भी यह श्वासरोगों से मरने वालों से कम ही होगी .

इस सम्मलेन में श्वास रोगों को लेकर दुनिया का पहला एटलस भी जारी किया गया जिस में इन रोगों की सम्पूर्ण व्याख्या की गयी है. इस एटलस में भारत के बारे में भी एक अध्याय है.  इस के अनुसार दुनिया भर में हर सेकंड न्यूमोनिया के कारण एक बच्चे की मौत हो जाती है और यह रोग भी दुनिया भर में भारत में सर्वाधिक है. हर साल लगभग साढ़े चार करोड़ से ज्यादा बच्चे भारत में न्यूमोनिया से बीमार होते हैं.

यूनियन की शिशु स्वास्थ  निदेशक पेनी एनआरसन का कहना है कि इस के लिए हिब और अन्य वैक्सीन का प्रयोग बहुत ज़रूरी है.   एटलस के अनुसार भारत में अभी भी लगभग बयासी करोड़ लोग लकड़ी, कोयला या अन्य किसी प्रदूषणकारी ईंधन का इस्तेमाल करते हैं जिस से फेंफडों के रोग फैलते हैं.

वैसे दुनिया की आधी आबादी ऐसे ही इंधन का प्रयोग करती है. पर्यावरण प्रदूषण से तो यह रोग और भी ज्यादा फैलते है और इस मामले में भी भारत आगे है. दिल्ली और कोलकत्ता तो दुनिया के सब से ज्यादा प्रदूषित शहरों में शामिल हैं.

यूनियन के लंग हेल्थ निदेशक चेन यूँआन चांग के अनुसार खाना पकाने की साफ़ आदते, प्रदूषण रहित ईंधन और चिमनी के इस्तेमाल से फेंफडों के रोगों से बचा जा सकता हैं.  सम्मलेन में तपेदिक यानी टी बी रोग पर वैश्विक रिपोर्ट भी जारी की गयी.  इसमें भी भारत में इस रोग के सर्वाधिक रोगी होना बताया गया है. पिछले साल विश्व भर में तेरह लाख लोग टी बी से मरें और इन में सबसे ज्यादा तीन लाख रोगी भारत के थे.

सबसे ज्यादा गंभीर बात यह है कि हर साल बीस लाख नए लोगों को टी बी हो जाती है. रिपोर्ट में  इस बात का भी खुलासा हुआ है कि तपेदिक का शिकार वे लोग ज्यादा होते हैं जो तम्बाकू का इस्तेमाल करते है . भारत में चौबीस करोड़ से ज्यादा लोग तम्बाकू का इस्तेमाल करते हैं  और लगभग दस लाख लोग हर साल इस के कारण होने वाली बीमारियों से भी मरते हैं.

यूँ तो डोट्स कार्यक्रम के सफलता की कहानियां भारत में अक्सर सुनायी जाती है पर यह भी सही है कि इस के बावजूद भारत में तपेदिक बढ़ता ही जा रहा है.

सम्मलेन में भारतीय प्रतिनिधियों में इस बात की भी चिंता  थी कि जब विश्व स्वास्थ संगठन के अनुसार भारत की एक तिहाई जनता में टी बी होने की सम्भावना है तो क्यों अन्य देशों की तरह भारत सरकार भी इस के लिए आइ. पी. टी. दवाओं का वितरण नहीं करती.

सम्मलेन में पढ़े गए एक अन्य शोध पत्र में भी “डाट्स कार्यक्रम” के लिए दवा बनानें वाली कंपनियों द्वारा विकासशील और विकसित  देशों के लिए अलग- अलग गुणवत्ता की दवाएं बनाने की ओर भी ध्यान दिलाया गया.

अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञों तक ने यह माना की टी बी चूंकि विकसित  देशों की बीमारी नहीं है इस लिए भी इस रोग पर शोध कम हो रहा है और वैक्सीन तथा नयी दवाएं नहीं खोजी जा रही हैं.

यहाँ तक की स्वाईन फ्लू का वैक्सीन भी अत्यंत कम समय में खोज लिया गया पर टी बी से अभी भी सौ साल पुराने बी. सी. जी.  वैक्सीन से निबटा जा रहा हैं.  अमरीका के  मैक-गिल विश्वविद्यालय में भारतीय मूल के डॉक्टर मधुकर पाई बताते हैं कि अगर टी बी से निबटना है तो भारत को इस रोग की जांच के लिए उपयोग में लाये जा रहे  थूक की जांच से ऊपर उठ कर आधुनिक उपायों को काम में लेना होगा.

रिपोर्ट: जसविंदर सहगल, बर्लिन

संपादन: उज्ज्वल भट्टाचार्य

Written by JournalistsAgainstTB

January 9, 2011 at 5:47 am

Posted in TB and Media

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